‘खबर वह है, जिसे को� दबान� चाहे� बाकी सब केवल विज्ञापन है�
सर जेम्� बेवन, भारत मे� ब्रिटि� उच्चायुक्त का बृहस्पतिवा�, 11 दिसंबर 2014 को दिल्ली मे� पत्रकारो� से मुलाका� के दौरा� दि� गए अभिभाष� की अनूदित प्रति।

सम्मानित अतिथिग�, मित्रो और सहयोगियो
मीडिया के हमार� मित्रो� के लि� हमार� इस वार्षि� लं� मे� आप सबका स्वागत है� पत्रकारो� और राजनयिको� की प्रवृत्त� एक-दूसर� के लि� जर� शंकालु होने की होती है� यद� आप एक नए ब्रिटि� राजदूत है� और विदे� जाने की तैयारी मे� है�, तो आपको मीडिया को संभालन� के लि� विदे� कार्यालय का एक कोर्� करना होगा, और आपको जो पहली ची� बताई जाएगी, वह यह है कि ‘ऑ� � रिकार्ड� जैसी को� ची� नही� होती�
लेकि� मेरा खयाल है कि हम राजनयि� और आप पत्रका� एक दूसर� पर शक करके गल� करते हैं। वास्तव मे�, मै� सोचत� हू� कि हमें एक-दूसर� की इज्ज� करनी चाहि�, क्योंक� हम दोनो� एक ऐस� महत्वपूर्ण का� मे� लग� है�, जो दुनिया को एक बेहत� जग� बनान� मे� सहाय� है, और इसलि� कि हम वास्तव मे� बहुत कु� एक जैसे हैं।
हम दोनो� ही:
- अपने आसपा� की दुनिया मे� दिलचस्पी लेते है�
- संपर्क बनान� और चीजो� को ढूंढ निकालन� मे� कुशल होते है�
- अक्स� जटिल मसलो� को सर� भाषा मे� अभिव्यक्� करते है�
- किस्सो� मे� से यथार्थ निकालन� मे� माहिर। � तो राजनयि� और � पत्रका� ही, सुनी हु� हर बा� पर यकी� करते हैं।
हम दोनो� ही सभ्य पेशेवर हैं। परस्पर मतभेदो� को सुलझान� के लि� कूटनीति, युद्� की अपेक्ष� अधिक बेहत� तरीका है� और अच्छी पत्रकारिता वह है जो समाजों को मुक्� और सरकारो� को ईमानदा� बनाए रखे। जैसा कि वाशिंगटन पोस्� के पूर्� प्रकाश� कैथेरी� ग्राहम अक्स� कह� करती थी�:
खब� वह है, जिसे को� दबान� चाहे� बाकी सब तो विज्ञापन है�
हम दोनो� सच बोलन� को प्रतिबद्� हैं। राजनयिको� को यह अपनी सरकारो� को कहना पड़ता है, यहां तक कि जब वे इस� सुनन� नही� चाहत� तब भी� पत्रकारो� को यह अपने पाठकों को कहना पड़ता है, और यह उनका कर्तव्� है कि वे बिना किसी भय और समर्थन के बुरी खबरो� और उसी तर� अच्छी खबरो� के बारे मे� भी बताएं। वास्तव मे� मीडिया मे� बुरी खबरे�, खासतौर पर इन दिनो� सरका� के बारे मे�, एक अच्छी बा� है, क्योंक� यह इसका स्पष्ट संके� है कि हम एक स्वस्थ लोकतंत्र मे� रह रह� हैं। ऐस� दे� जिनक� अखबा� अच्छी खबरो� से भर� है�, ऐसी जे� की तर� लगते है�, जो अच्छ� लोगो� से भर� हैं।
हम दोनो� अपने दोनो� पेशो� मे� समान जोखिमो� का सामन� करते हैं। इनमे� से कु� जोखि� तो बेहद वास्तविक है�: कई पत्रका�- जिसमें 2014 के 100 से ज्यादा शामि� है�- हर वर्ष खतरनाक जगहो� पर घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हु� मारे जाते है�, और कई सारे राजनयि� भी इसी तर�: जैसे गत मा� ब्रिटि� दूतावा� के दो सदस्� काबु� मे� आतंकियों द्वारा मारे गए�
कु� जोखि�, जिन्हे� हम झेलत� है�, मनोवैज्ञानिक है�: जो कु� अधिकारप्राप्� लो� आपसे कहते है�, उस पर शक करना अच्छ� है, और पत्रका� तथ� राजनयि� ऐस� ही करते हैं। लेकि� आपको उन संदेहो� को व्यामो� तक ले जाने से बचना चाहि�: कई सारे राजनीतिज्� तथ� सरकारी सेवक अच्छ� लो� होते है�, जो इस दुनिया को एक बेहत� जग� बनान� चाहत� है�, सच बोलत� है� और विभिन्� परिस्थितियों मे� सही का� करने का प्रयास करना चाहत� हैं।
हमार� दोनो� पेशो� के एक जैसे नियम हैं। पत्रकारिता का पहला नियम है: भव� से बाहर निकलें� यही राजन� का भी पहला नियम है या होना चाहिए।
जब तक आप दूतावा� और राजनयि� तामझाम से बाहर नही� निकलते है�, आप यह नही� जा� सकते कि बाहर की वास्तविक दुनिया मे� क्या हो रह� है� यही वज� है कि मैंन� भारत के 29 राज्यो� मे� से हर एक का दौरा किया है, और जब भी बाहर निकल� तो जि� तर� शानदार शहरो� का दौरा किया उसी तर� अक्स� ग्रामी� भारत मे� भी बाहर निकल कर घूमा�
हम दोनो� को सा� बाते� पसंद हैं। मार्� ट्वे� ने कह� था:
वास्तविक दुनिया मे�, सही चीजे� सही वक्त और सही सम� पर नही� हु� करती हैं। यह इतिहासकारो� और पत्रकारो� का का� है कि वे उस� वैसा ही पे� करें, जैसी वे हैं।
और हम दोनो� यह समझत� है� कि हमार� पेशो� की पहली जरूर� लोगो� का ध्या� इस ओर आकृष्ट करान� है, जो हम कह रह� हैं। अमेरिक� के सबसे प्रभावशाली संपादकों मे� से एक, आर्थ� ब्रिसबेन ने एक बा� कह� था:
अग� आप अपनी पहली पंक्ति से अखबा� के पाठक का ध्या� खींच नही� लेते, तो आपको अगली पंक्ति लिखन� की को� जरूर� नही� है�
इन सब के अलाव�, संभवतः हम कु� मामलों मे� अल� भी हैं। एक पत्रका� के तौ� पर आपका का� है, आपकी चुनी हु� भाषा मे� यथासंभ� स्पष्ट रू� से संपर्क स्थापि� करना� यह कह� जाता है कि एक राजनयि� वह है जो सफलतापूर्व� विभिन्� भाषाओं मे� अपनी बातो� से भ्रम पैदा कर सके।
और हम राजनयिको� को कभी-कभी आप पत्रकारो� से थोड़ा सा अल� बर्ताव भी करना होता है, या कम से कम ऐस� करने का दिखावा करना होता है� ऐसी बाते� है� जो आप कर और कह सकते है�, जिन्हे� हम राजनयि� नही� कर सकते, कदाचित, यद� हम ऐसी नक� करें तो यह आपके लि� अच्छी किंत� हमार� लि� बुरी होगी�
आपमे� से कु� ने कह� कि मेरा ट्विटर एकाउंट थोड़ा उबाऊ लगता है।इसकी वज� यह है कि: मै� अपने का� को पसंद करता हू� और इस� करते रहना चाहत� हूं। एक राजनयि� के लि� ट्विटर पर बहुत ज्यादा दिलचस्� होना उसकी बर्खास्तगी का एक त्वरित तरीका है� मुझे भारत अच्छ� लगता है और मै� यहां रहना चाहत� हूं।
तो अब मुझे अपनी बा� खत्म करते हु� आप सब के का� और बीते वर्ष मे� आपके सहयो� के लि� आपका शुक्रिया अद� करने की इजाज� दीजिए। मै� आश� करता हू� कि अगले वर्ष भी मुझे आपलोगो� से यही� मुलाका� का सौभाग्� प्राप्� होगा- बशर्ते कि मै� अगले 12 महीनो� मे� कु� बेहद मूर्खतापूर्ण � कर बैठूं। इसी बी� मै� आपको प्रोत्साहि� करता हू� कि आप अपने मुश्कि� सवालों से मेरे जैसे लोगो� को कठिनाई मे� डा� दे�- लेकि� यहां इस वक्त नहीं।